केंद्र बनाम राज्य: जीएसटी में छूट और हिंदी थोपने का विवाद क्यों बना राजनीति का नया मोर्चा?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला। विषय था जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) में हालिया छूट का समय और राज्यों को उनके हक के फंड न मिल पाना। स्टालिन ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह तमिलनाडु जैसे राज्यों को “हिंदी थोपने” का विरोध करने की सज़ा दे रही है।
यह विवाद सिर्फ एक आर्थिक बहस नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की संघीय व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंधों और सांस्कृतिक अस्मिता के सवालों पर एक नया और तीखा मोर्चा खोल गया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
स्टालिन का आरोप: “8 साल पहले क्यों नहीं मिली यह छूट?”
हाल ही में, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि जीएसटी सुधार और आयकर में राहत से भारतीयों को 2.5 लाख करोड़ रुपये की बचत होगी। इस पर स्टालिन का सवाल बहुत सीधा है। उन्होंने कहा, “यह वही है जिसकी मांग विपक्ष शुरू से करता आया है। अगर यह कदम आठ साल पहले उठाए गए होते, तो देश के करोड़ों परिवारों ने कई लाख करोड़ रुपये और बचाए होते।”
स्टालिन का मतलब साफ है – केंद्र सरकार ने जानबूझकर इन सुधारों में देरी की, जिससे आम जनता को फायदा नहीं मिल सका। लेकिन उनका दूसरा आरोप और भी गंभीर है।
“राहत का आधा बोझ राज्यों पर, लेकिन श्रेय ले रहा है केंद्र”
स्टालिन ने एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया। जीएसटी एक ऐसा टैक्स है जिसका राजस्व केंद्र और राज्य आपस में बांटते हैं। इसलिए, जब जीएसटी में छूट मिलती है, तो राजस्व का नुकसान सिर्फ केंद्र का नहीं होता, बल्कि राज्यों की आय भी प्रभावित होती है।
स्टालिन के शब्दों में, “इस राहत का 50 प्रतिशत बोझ वास्तव में राज्य सरकारों ने उठाया है, एक ऐसा तथ्य जिसे केंद्र सरकार ने न तो स्वीकार किया है और न ही सराहना की है। इसके विपरीत, केंद्र की भाजपा सरकार राज्यों का हक का पैसा देने से इनकार कर रही है।”
यहाँ से बहस का रुख सीधे तौर पर भाषा और संस्कृति के मुद्दे पर मुड़ जाता है।
“हिंदी थोपने के विरोध की सज़ा है फंड रोकना”
स्टालिन ने सीधे आरोप लगाया कि तमिलनाडु को ‘समग्र शिक्षा’ (Samagra Shiksha) के फंड इसलिए नहीं दिए जा रहे क्योंकि राज्य सरकार हिंदी थोपने का विरोध करती है और नई शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने से इनकार करती है।
उन्होंने पूछा, “तमिलनाडु को समग्र शिक्षा फंड सिर्फ इसलिए नहीं दिए जा रहे क्योंकि हम हिंदी थोपने को स्वीकार नहीं करते। यह अन्याय कब तक चलेगा?”
यह आरोप कोई नया नहीं है। तमिलनाडु की डीएमके सरकार लंबे समय से केंद्र की शिक्षा नीतियों में हिंदी के बढ़ते प्रभाव और राज्यों की शिक्षा व्यवस्था पर केंद्र के दखल का विरोध करती आई है। स्टालिन ने केंद्र से अपील करते हुए कहा, “भारत उन राज्यों को दंड देकर नहीं बढ़ सकता जो अपने अधिकारों की रक्षा करते हैं और अपने लोगों के लिए खड़े होते हैं। संघवाद का सम्मान करें, फंड जारी करें, और लोगों को उनका हक मिलने दें।”
भाजपा का जवाब: “स्टालिन को अर्थव्यवस्था की समझ नहीं”
भाजपा प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने स्टालिन की आलोचना को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि स्टालिन को टैक्स और अर्थव्यवस्था की बुनियादी समझ ही नहीं है।
तिरुपति का तर्क था कि ये सुधार अब ही संभव हो पाए क्योंकि अब टैक्स बेस काफी बढ़ गया है। उन्होंने कहा, “आठ साल पहले सिर्फ 50 लाख टैक्स असेसी (assessees) थे। आज हमारे पास डेढ़ करोड़ हैं।” उनका मतलब था कि जीएसटी के आने के बाद टैक्स चोरी कम हुई है और व्यवस्था में पारदर्शिता आई है, जिससे राजस्व बढ़ा है और अब राहत देना संभव हो पाया है।
भाजपा नेता ने यह भी दावा किया कि जीएसटी सुधारों से राज्यों को फायदा ही हुआ है। उन्होंने कहा, “राज्यों की जीएसटी राजस्व समय के साथ बढ़ी है। यह भी सच है कि उच्च जीएसटी के तहत राज्यों ने 50% अधिक कमाई की है।”
नई शिक्षा नीति (NEP): विवाद की जड़
इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में फिर से साफ किया था कि ‘समग्र शिक्षा’ जैसी योजनाओं का फंड जारी करने के लिए राज्यों का NEP को लागू करना अनिवार्य है।
तमिलनाडु सरकार का मानना है कि NEP शिक्षा में केंद्र का दखल बढ़ाती है और इसकी कुछ धाराएँ हिंदी को बढ़ावा देकर क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। इसी विवाद के चलते तमिलनाडु सरकार ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया है। वह चाहती है कि केंद्र, NEP को लागू करने के लिए राज्यों को बाध्य न करे और शिक्षा जैसे विषय पर राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करे।
निष्कर्ष: संघवाद बनाम एकरूपता का सवाल
यह विवाद सिर्फ पैसे के बंटवारे का नहीं है। यह एक बहुत बड़े सवाल की तरफ इशारा करता है: क्या भारत की विविधतापूर्ण पहचान और संघीय ढाँचे को बनाए रखते हुए विकास संभव है?
एक तरफ, केंद्र सरकार का तर्क है कि देशव्यापी सुधारों (जैसे जीएसटी और NEP) और एक साझा पहचान (जिसमें हिंदी की भूमिका शामिल है) के बिना तरक्की की रफ्तार धीमी हो जाएगी।
दूसरी तरफ, तमिलनाडु जैसे राज्यों का मानना है कि विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो क्षेत्रीय अंतर, भाषाई विविधता और राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करे। उनके लिए, अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा करना कोई ‘विरोध’ नहीं, बल्कि अपना संवैधानिक अधिकार है।
स्टालिन और मोदी सरकार के बीच यह टकराव, असल में, भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की उस बुनियादी बहस को दर्शाता है जो देश के बनने के समय से चली आ रही है – एक केंद्रित शक्ति और मजबूत राज्यों के बीच का संतुलन। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत और जनता इस बहस पर क्या फैसला सुनाती हैं।